राहुल गांधी के ‘वोट-चोरी’ खुलासों पर गौर करें, तो ये अपने आप में धारणा के स्तर पर कोई नई बात नहीं बताते। चाहे कर्नाटक के महादेवपुरा का मामला हो या हरियाणा विधानसभा चुनावों से पहले फर्जी मतदाता जोड़े जाने का या उससे भी पहले महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच मतदाता सूची में नए फर्जी नाम डालने का – ये कोई नए आरोप नहीं हैं।
चुनाव में गडबड़ी से जुड़े ऐसे आरोप कांग्रेस पहले से लगाती रही है। कुल मिलाकर कांग्रेस समर्थक या कहें भाजपा विरोधी तबकों में ये बातें काफी समय से हो रही हैं और इन तबकों के ज्यादातर लोग इस बात को लेकर लगभग पक्की राय बना चुके हैं कि अमित शाह की अगुआई वाली भाजपा की चुनावी मशीनरी सधे अंदाज में इस तरह की करतूतों को अंजाम देती है और इन्हें ढकने के लिए संघ स्वयंसेवकों की परदे के पीछे की जा रही मेहनत से लेकर लाभार्थियों और मोदी के निष्ठावान मतदाताओं की भूमिका तक तमाम तरह की व्याख्याएं तैयार रखती है जो चुनाव नतीजों को जस्टिफाई करने के काम आती हैं।
सवाल है कि ऐसे में राहुल गांधी के इन खुलासों को कैसे देखा जाए? क्या इनकी कोई अहमियत नहीं है? सचाई यह है कि ये खुलासे बेहद अहम हैं। ये सूचना या धारणा के स्तर पर भले कोई नई बात न स्थापित कर रहे हों, राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस की कार्यशैली के बारे में जरूर कुछ नई बातें बता रहे हैं।
ये बताते हैं कि जब मोदी की अगुआई वाली भाजपा अमित मालवीय के आईटी सेल के सहारे फर्जी खबरें और वीडियो क्लिपिंग के जरिए फेक नैरेटिव गढ़कर सब कुछ हासिल कर लेने की नीति पर चल रही है, तब राहुल गांधी की टीम मीडिया लाइमलाइट से दूर रहकर धैर्यपूर्वक लंबा कार्य करके नतीजे हासिल करने की रणनीति अपना चुकी है।
भाजपा भले महाराष्ट्र और हरियाणा में मिली जीत का ढोल पीटने में लग गई, राहुल की टीम उसकी चिंता किए बगैर उनके फर्जीवाड़े को समझने और उसे एक्सपोज करने लायक ठोस सबूत जुटाने में लगी रही और तभी सामने आई जब ‘ठोस’ सबूत मिल गए।
इसके बावजूद ओपिनियन के स्तर पर कांग्रेस को तत्काल कोई बड़ी सफलता नहीं मिलने वाली। जिन्हें राहुल के इन खुलासों ने उद्वेलित किया, वे ज्यादातर वही लोग हैं जो पहले से कांग्रेस के इन दावों में काफी हद तक विश्वास करते रहे हैं कि मोदी के लोग चुनावों में फर्जीवाड़ा करते हैं। जो इस दावे को स्वीकार नहीं करते वे अब भी, राहुल के इन खुलासों के बाद भी, प्राय: अपनी पुरानी राय पर कायम हैं।
नई बात सिर्फ यह है कि राहुल गांधी के इस नए रुख ने यह उम्मीद जगाई है कि कांग्रेस इस मुद्दे को छोड़ेगी नहीं। अगर वह इसे नहीं छोड़ती और तत्काल कुछ हासिल कर लेने के मोह से ऊपर उठकर अपने लंबे अभियान में लगी रहती है तो राहुल के शब्दों में ‘हिंदुस्तान की आत्मा’ बचाने की लड़ाई को आगे ले जा सकती है।
इसके लिए उसे ‘खुलासों’ की सीरीज तक सीमित न रहकर ठोस कार्यक्रम पर उतरना होगा। एक ही दिन विशाल रैली करने या कोई एक लंबी यात्रा शुरू करने के बजाय विकेंद्रित रूप में ब्लॉक, तहसील और जिला स्तर पर छोटे-छोटे कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू करना और उसे जारी रखना होगा।
अगर वह इस बात से पूरी तरह आश्वस्त है कि भाजपा ने चुनाव प्रक्रिया को फिक्स कर लिया है तो इस प्रक्रिया से निकली सरकारों को अवैध घोषित करते हुए कांग्रेस को इस सरकार से असहयोग के शांतिपूर्ण तरीके ढूंढ़ कर उसे आम देशवासियों के बीच ले जाना होगा। अगर वह इस तरह का कोई लंबा अभियान शुरू करती है और उसे विश्वसनीय ढंग से जारी रखती है तो अगले दो-तीन साल में देश में राजनीति की नई इबारत उभर सकती है।
(प्रणव प्रियदर्शी की टिप्पणी फेसबुक से साभार)